बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ! खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी !

बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी !
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी !

ग्वालियर में स्थित है महारानी झांसी लक्ष्मी बाई की समाधि

ग्वालियर देश में 18 57 का स्वतंत्रता संग्राम का पहला आगाज करने वाली महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का बलिदान को देश भुला नहीं सकता उनकी बलिदान गाथा को सुनकर आज भी युवाओं में जोश भर आता है उनकी वीर गाथाओं के चर्चे कई दशकों से सुनते आ रहे हैं ऐसी थी अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाली महारानी झांसी लक्ष्मी बाई !

ग्वालियर के पड़ाव स्थित वीरांगना लक्ष्मीबाई की समाधि जिला पुरातत्व विभाग के अधीन है इस समाधि की देखभाल जिला पुरातत्व विभाग एवं नगर निगम विभाग कर रहा है वीरांगना के मेले पर लाइट की साज-सज्जा नगर निगम ग्वालियर के द्वारा की जाती है फुलवाग के निकट स्वर्ण रेखा नाले के किनारे वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का एक छोटी सी समाधि बनी हुई है रानी लक्ष्मीबाई पुरुष वेश में घोड़े पर तलवारों पर उठाए शत्रु पर आक्रमण की मुद्रा दिखाई पड़ती है उनकी पीठ पर उनका दत्तक पुत्र दामोदर राव हुआ करता था दुर्भाग्य से बच्चे का यह पुतला वर्तमान में गायब है यह सुंदर समाधि उस घटना की याद दिलाती है जो 17 जून सन 1858 को लगभग इसी क्षेत्र में घटित हुई 1 जून सन 1858 ईस्वी को रानी लक्ष्मीबाई तात्या टोपे राव साहब तथा बांदा के नवाब ने बिना किसी विशेष प्रतिरोध के ग्वालियर दुर्ग पर अपना कब्जा कर लिया था यह एक बड़ी महत्वपूर्ण घटना थी और अंग्रेज इस घटना के महत्व को समझते थे अंग्रेज सेनापति सर हयूरोज छुट्टी पर जा रहा था परंतु उसने स्वयं ही अपनी छुट्टी निरस्त कर दी तथा बहुत तीव्र गति से ग्वालियर को बढ़ना शुरू किया उसने अपने अधीनस्थ सैनिकों को भी जल्दी-जल्दी ग्वालियर पहुंचने का आदेश जारी किए आगरा में कर्नल रीडर राजपूताना फील्ड फोर्स के साथ ब्रिगेडियर स्मिथ हैदराबाद कन्टीजेण्ट के साथ मेजर और तथा अन्य सैनिक अधिकारी चारों तरफ से ग्वालियर पर टूट पड़े सर हयूरोज ने 16 जून को दुर्ग पर आक्रमण किया परंतु मुख्य लड़ाई 17 जून को हुई…

जिसमें रानी लक्ष्मीबाई ने अपना बलिदान किया उनके साथ उनकी विश्वसनीय सखी मुंदर भी शहीद हुई इस भीषण युद्ध में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई को काफी घायल अवस्था में उनके अनुचरो ने निकट ही स्थित बाबा रामदास की कुटिया में महारानी लक्ष्मी बाई को लेकर आए महारानी ने बाबा रामदास महाराज से कहा कि मेरे शरीर को अंग्रेज छू ना सके तब बाबा राम दास द्वारा महारानी लक्ष्मीबाई के शहीद हो जाने पर उनके शरीर को अग्नि को समर्पित किया रानी का स्मारक उसी मैदान में स्थापित की गई है… जहां 17 जून सन 1858 का युद्ध लड़ा गया था तथा रानी ने स्वतंत्रता के समर में आत्महुति समर्पित की

वहीं वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार राकेश अचल अपनी किताब गद्दार में लिखते हैं कि भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी 1857 मैं फूटी और 18 58 में बुझ गई इस काल में झांसी की रानी की शहादत और ग्वालियर के सिंधिया शासकों की भूमिका हमेशा चर्चा में रही 18 58 में सिंधिया परिवार के ऊपर गद्दारी का जो कलंक लगा वह आए डेढ़ सदी बीतने के बाद भी धूमिल नहीं हुआ है 1858 में ग्वालियर रियासत के प्रमुख महाराज जयाजीराव सिंधिया की उम्र कोई 23 साल की थी वह स्वतंत्र महाराज के रूप में अपने अधिकारों का इस्तेमाल भी नहीं कर रहे थे उनके दाएं बाएं अंग्रेजों के एजेंट थे एक दीवान दिनकर राव राजवाड़े और एक मेजर जनरल कपर्सन सिंधिया के तमाम फैसलों के पीछे यही जोड़ी थी अगर यह दो लोग सिंधिया के इर्द-गिर्द ना होते तो मुमकिन है कि 18 57 के गदर की सूरत कुछ और होती दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश दस्तावेजों मैं रानी झांसी से युद्ध के प्रशन को छोड़ बाकी तमाम सूचना परस्पर विरोधी नजर आई रानी लक्ष्मी के अंतिम क्षणों के बारे में अंग्रेज भी अपनी डायरियो और रिपोर्ट्स में प्रामाणिक रूप से कुछ नहीं बता सके बावजूद इसके यह दो तथ्य स्थापित होते हैं की रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर में शहीद हुई और तत्कालीन सिंधिया शासकों ने उनका साथ नहीं दिया परिस्थितियां ही ऐसी थी कि सिंधिया रानी लक्ष्मीबाई का साथ नहीं दे सकते थे लेकिन सिंधिया ने यह कभी नहीं सोचा होगा की अंग्रेजों और दीवान दिनकर सब की साजिश उन्हें इतनी भारी पड़ेगी कितने दिनों तक उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा!

महारानी के उत्सर्ग दिवस पर उनकी समाधि पर बलिदान मेला आयोजित किया जाता है इस अवसर पर शासन द्वारा स्थानीय अवकाश घोषित किया जाता है वही इस अवसर पर देश के प्रसिद्ध वीर रस के कवियों द्वारा कवि सम्मेलन आयोजित किया जाता है वही गंगा दास की बड़ी साला के महंत रामसेवक दास जी महाराज ने बताया की महारानी लक्ष्मीबाई के शरीर को अंग्रेज न छू सके इसके लिए गंगा दास जी की साला के 745 साधु-संतों ने अपनी जान की आहुति दी जिन की समाधि भी गंगा दास की बड़ी शाला में बनी हुई है उन्होंने बताया कि महाराज गंगा दास जी ने झांसी की रानी लक्ष्मी बाई के पुत्र दामोदर राव को अपने दो साथियों के साथ मुंडन कराकर इंदौर के लिए भेज दिया!
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की समाधि को देखने के लिए एवं नतमस्तक करने के लिए देश विदेश से पर्यटक आकर यहां शीश झुका कर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं

जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी
होवे चुप इतिहास लगे सच्चाई को चाहे फांसी
हो मदमाती विजय मिटा दे गोलों से चाहे झांसी
तेरा स्मारक तू ही होगी
तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

Courtesey..

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