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आखिर बाढ़ में क्यों डूब रहे हैं दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु जैसे हमारे मेट्रो शहर?

पहाड़ से लेकर मैदानी इलाकों तक बारिश तबाही मचा रही है. हाल के दिनों में दिल्ली की सड़कें पानी में डूबी नजर आईं. मुंबई में भी सैलाब का नजारा दिखा. ये हाल सिर्फ इन मेट्रो शहरों का ही नहीं है बल्कि देश के कई राज्यों की मेट्रो सिटी से लेकर महानगरों तक जल प्रलय से बच नहीं पाए. यह हाल उन शहरों का है जहां सरकारें इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर भारी भरकम बजट खर्च करने की बात करती हैं लेकिन तबाही का मंजर हर साल सामने आकर खड़ा हो जाता है और सारी तैयारियां इसको रोकने में नाकाफी साबित होती हैं.

दरअसल, देश के बढ़ते शहरी क्षेत्र बाढ़ और उसके संकट को लेकर संवेदनशील होते जा रहे हैं. इसकी वजह से बिजली की लाइनें टूटना, दुर्घटनाएं, कारों का डूबना और पानी से भरे अंडरपास में मौतें आम बात हो गई हैं. विशेषज्ञों और शहरी योजनाकारों ने इस शहरी बाढ़ का कारण अनियंत्रित विकास और बदलते मौसम को प्रमुख कारण माना है. जानकारों की मानें तो भारत में शहरी आबादी जिस दर से बढ़ रही है, उसके साथ तैयारी का तालमेल नहीं बन पा रहा है.

राज्य सरकार की विफलताएं
पिछले हफ्ते, यमुना नदी में जल स्तर अब तक के हाई लेवल पर पहुंच गया, जिससे दिल्ली के कई इलाकों में बाढ़ आ गई. वहीं एक बार फिर यमुना उफना रही है. इस महीने की शुरुआत में मुंबई में बाढ़ आई, जबकि अहमदाबाद और गुरुग्राम जैसे शहर भी मानसून की बारिश में डूब गए. नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चेन्नई में 2015 की बाढ़, जिसमें 289 लोग मारे गए थे. वह भारी बारिश के साथ-साथ सरकारी एजेंसियों की ओर से कई विफलताओं के कारण हुई थी. इस रिपोर्ट में राज्य सरकार की आलोचना की गई.

सामान्य बारिश के लिए भी नहीं तैयार
प्रख्यात जलवायु वैज्ञानिक प्रोफेसर जे श्रीनिवासन का कहना है कि शहर की बढ़ती आबादी के साथ-साथ भौतिक बुनियादी ढांचे की मांग को पूरा करने की दोहरी चुनौतियों से जूझ रहे हैं. इसकी वजह से वह मौसम की घटनाओं, यहां तक कि सामान्य बारिश के लिए भी तैयार नहीं हो पा रहे हैं. आप हमेशा मानसून को दोष नहीं दे सकते. हमारे शहरी क्षेत्रों का प्रबंधन ठीक से नहीं किया गया है. उन्होंने बताया कि हमारी जनसंख्या बढ़ गई है और इसलिए शहर की मांगें नई हैं. उन्हें उस हिसाब से तैयार करना पड़ेगा.

बारिश के पानी का सीमित रिसाव
शहरों में जनसंख्या बढ़ने का मतलब है प्राकृतिक बुनियादी ढांचे का नुकसान, सिकुड़ते जल निकाय, निचले और संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण, पहले से ही लबालब, खराब रखरखाव वाली नालियों का अतिक्रमण. इसके साथ ही अधिक सड़कों और फुटपाथों का मतलब है बारिश के पानी का सीमित रिसाव फिर इसका परिणाम बाढ़ और जलजमाव के रुप में हमारे सामने आता है.

ड्रेनेज मैनेजमेंट प्लान नहीं हुआ लागू
एक रिपोर्ट के मुताबिक आईआईटी के एक प्लान आया था ड्रेनेज मैनेजमेंट प्लान, जो कि शहरों की गलियों और सड़कों पर रुकने वाले पानी को बाहर निकालने के लिए था. लेकिन साल 2018 में दिल्ली सरकार ने इसको बहुत गंभीरता से नहीं लिया. अब हाल ही में हमने देखा कि राजधानी की स्थिति क्या हुई. भारी बारिश के साथ जब यमुना उफनाई तो उसने दिल्ली के कई इलाकों को तालाब बना दिया. हालात ये हो गए कि लोगों को नाव से रेस्क्यू करके निकाला गया.

तेजी से बढ़ रही शहरों की जनसंख्या
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अभी 37 करोड़ लोग शहरों में रह रहे हैं. लेकिन 2060 तक यह आंकड़ा 60 करोड़ और 2080 तक 80 करोड़ तक पहुंच जाएगा. अब इसको कंट्रोल करने या उस हिसाब से शहरों को तैयार करने की योजना सरकारों के पास नहीं है. अगर है भी तो बजट न होने का हवाला दे दिया जाता है. दरअसल हमारे देश में त्रिस्तरीय व्यवस्था चलती है. इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकार, अर्बन लोकल बॉडी यानि नगर निगम या निकाय और पंचायती राज शामिल है. इसमें सबसे बड़ा रोल अर्बन लोकल बॉडी का होता है.

डिसेंट्रलाइजेशन से खत्म होगी समस्या
अब नगर निगम या निकाय का काम शहर की व्यवस्था को ठीक रखना है, उसमें पानी, सड़क, अतिक्रमण जैसे महत्वपूर्ण काम शामिल हैं. लेकिन यह अपना काम कभी लापरवाही तो कबी बजट की कमी में नहीं कर पाते. समझने वाली बात यह है कि ये चीजें तब तक ठीक नहीं होंगी जब तक विकेन्द्रीकरण (Decentralisation) की व्यवस्था लागू नहीं होगी. इसका मतलब यह है कि निगमों, निकायों और पंचायतों को इतनी तकत देनी होगी की वो ग्रांट पर निर्भर न रहें.

आबादी के हिसाब से स्टाफ की कमी
दरअसल आज की हालत यह है कि शहरों के मेयर के पास ज्यादा कुछ पावर होती ही नहीं है. अब ऐसे में नगर निगम और नगर निकाय भारी भरकम टैक्स जुटाकर राज्य सरकार और केंद्र सरकारों को देते हैं लेकिन उन्हें खर्च करने का अधिकार नहीं हैं. खर्चे के लिए उन्हें राज्य सरकार के आगे हाथ फैलाना ही है. अब होता यह है कि जितनी जरुरत है कई बार उतना पैसा मिल नहीं पाता. इसके साथ साथ शहरों की आबादी के हिसाब से स्टाफ की कमी भी एक बड़ी समस्या है जिससे विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं.

जल निकासी की मजबूत व्यवस्था

कुल मिलाकर बारिश और बाढ़ से निपटने के लिए जल निकासी का मजबूत व्यवस्था बनानी होगी. इसके लिए शहरी प्लानिंग के लिए बजट को प्राथमिकता के रुप में लेना होगा. अगर हम इसको लेकर गंभीर नहीं होगी तो प्राकृतिक आपदा हमारे जीवन की मुश्किलें बढ़ाती रहेगी.

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