आरएसएस के सौ वर्ष: राष्ट्रहित और
समरसता का शताब्दी पर्व….
(हाजी शीराज़ क़ुरैशी अधिवक्ता)
बाल-स्वयंसेवक, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच, भारत फर्स्ट एवं अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् से संबद्ध है
वर्ष 2025 भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव लेकर आया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने सौ वर्ष पूर्ण कर रहा है। किसी भी संगठन के लिए शताब्दी वर्ष केवल उत्सव का अवसर नहीं होता, बल्कि आत्ममंथन, उपलब्धियों के मूल्यांकन और भविष्य की दिशा निर्धारित करने का भी अवसर होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्षों की यात्रा भारत के राष्ट्रजीवन, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक समरसता और सेवा के इतिहास का अभिन्न अध्याय है।
1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में परम पूजनीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना की थी। उस समय भारत राजनीतिक दासता से जूझ रहा था, समाज जातीय और सामाजिक विभाजनों में बंटा हुआ था तथा राष्ट्रीय चेतना कमजोर पड़ रही थी। डॉ. हेडगेवार ने समझ लिया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं होगी; राष्ट्र को स्थायी रूप से सशक्त बनाने के लिए समाज का संगठन आवश्यक है।
उन्होंने कहा था—
“यदि समाज संगठित होगा तो राष्ट्र स्वतः सशक्त होगा।”
आज सौ वर्षों बाद यह विचार केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि भारत के जनजीवन में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाली वास्तविकता है।
मेरा व्यक्तिगत अनुभव: संस्कारों की वह यात्रा
एक स्वयंसेवक के रूप में जब मैं अपने जीवन की यात्रा पर दृष्टि डालता हूँ तो मुझे गर्व के साथ स्वीकार करना पड़ता है कि राष्ट्रवाद, अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक चेतना के जो बीज मेरे मन में पड़े, उनका प्रारंभिक स्रोत संघ प्रेरित शिक्षण संस्थान रहे।
मुझे सरस्वती शिशु मंदिर, ग्वालियर में अध्ययन का अवसर मिला। बाल्यावस्था में शायद हम यह नहीं समझते कि प्रार्थना, वंदना, गुरुजनों का सम्मान, राष्ट्रध्वज के प्रति आदर और मातृभूमि के प्रति प्रेम हमारे व्यक्तित्व को किस प्रकार आकार दे रहे हैं। किंतु समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि वही संस्कार जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं।
इसके पश्चात मुझे पार्वती बाई गोखले उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। वहाँ केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान नहीं दिया जाता था, बल्कि एक सजग, जिम्मेदार और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक बनने का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। विद्यालयों में मनाए जाने वाले राष्ट्रीय पर्व, महापुरुषों के जीवन प्रसंग, भारतीय संस्कृति पर आधारित कार्यक्रम तथा समाजसेवा की प्रेरणा ने मेरे व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।
आज जब मैं अधिवक्ता के रूप में न्यायालय में खड़ा होता हूँ, तब यह अनुभव करता हूँ कि सत्य, अनुशासन, राष्ट्रहित और कर्तव्यबोध के वे संस्कार मेरे व्यावसायिक जीवन का भी आधार बने हुए हैं।
संघ की पहचान: सेवा, संगठन और समर्पण
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने अपने कार्य का प्रचार कभी स्वयं नहीं किया। जब भी देश पर संकट आया, स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा के लिए उपस्थित हुए।
चाहे 1947 के विभाजन की त्रासदी हो, 1962 का युद्ध हो, 1971 के शरणार्थी संकट का समय हो, गुजरात और उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदाएँ हों या कोविड-19 महामारी—हर अवसर पर संघ के स्वयंसेवकों ने निस्वार्थ सेवा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
कोविड काल में लाखों परिवारों तक भोजन, दवाइयाँ, ऑक्सीजन और आवश्यक सहायता पहुँचाने का कार्य स्वयंसेवकों ने किया। अनेक स्थानों पर अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था स्वयंसेवकों ने संभाली। यह सेवा किसी जाति, धर्म या राजनीतिक विचारधारा को देखकर नहीं की गई, बल्कि मानवता के आधार पर की गई।
यही संघ की कार्यपद्धति है—“नर सेवा ही नारायण सेवा।”
समरसता: संघ की मूल साधना
संघ के बारे में अनेक प्रकार की भ्रांतियाँ फैलाई गईं, किंतु जिन्होंने संघ को निकट से देखा है वे जानते हैं कि संघ की मूल साधना सामाजिक समरसता है।
शाखा में व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, भाषा, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति से नहीं होती। वहाँ केवल एक पहचान होती है—वह भारत माता का पुत्र है।
संघ का स्वयंसेवक जब शाखा में खड़ा होता है तो उसके बगल में खड़ा व्यक्ति किसी भी जाति, समुदाय या वर्ग से हो सकता है, किंतु दोनों के बीच कोई भेद नहीं रहता।
सेवा भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, विद्या भारती और अनेक अन्य संगठनों के माध्यम से संघ ने वंचित, दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के उत्थान के लिए व्यापक कार्य किया है।
समरसता केवल भाषणों से नहीं आती, वह व्यवहार से आती है। संघ ने इसे व्यवहार में उतारने का प्रयास किया है।
आध्यात्मिक अध्ययन और भारतीय दृष्टि
बहुत से लोग संघ को केवल सामाजिक संगठन के रूप में देखते हैं, जबकि संघ की विचारधारा का एक महत्वपूर्ण आधार आध्यात्मिक अध्ययन भी है।
संघ भारतीय दर्शन, उपनिषदों, गीता, रामायण, महाभारत और संत परंपरा के जीवन मूल्यों को आधुनिक समाज के सामने प्रस्तुत करता है।
संघ का आध्यात्मिक दृष्टिकोण संकीर्ण नहीं है। वह “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे भारतीय आदर्शों पर आधारित है।
परम पूजनीय गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर कहा करते थे—
“हमारा राष्ट्र ही हमारा देवता है, उसकी सेवा ही हमारी पूजा है।”
यह कथन किसी राजनीतिक विचार का नहीं, बल्कि राष्ट्र को आध्यात्मिक साधना का विषय मानने वाली भारतीय दृष्टि का परिचायक है।
पंच परिवर्तन: भविष्य के भारत का मार्ग
संघ के शताब्दी वर्ष में विशेष रूप से “पंच परिवर्तन” की अवधारणा को समाज के सामने रखा गया है।
पंच परिवर्तन केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक नवजागरण का अभियान है। इसके प्रमुख आयाम हैं—
1. सामाजिक समरसता
समाज में जाति, वर्ग और भेदभाव की दीवारों को समाप्त करना।
1. कुटुंब प्रबोधन
परिवार व्यवस्था को मजबूत करना तथा भारतीय पारिवारिक मूल्यों का संरक्षण।
1. स्वदेशी
स्थानीय उत्पादों, स्थानीय कौशल और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
1. पर्यावरण संरक्षण
प्रकृति के साथ संतुलित जीवन तथा पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी।
1. नागरिक कर्तव्य
अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति जागरूकता।
यदि भारत का प्रत्येक नागरिक इन पाँच परिवर्तनों को अपने जीवन में अपनाए, तो सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
डॉ. मोहन भागवत के विचार: एकता का संदेश
संघ के वर्तमान सरसंघचालक आदरणीय डॉक्टर मोहन भागवत जी ने अनेक अवसरों पर स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भारत की विविधता उसकी शक्ति है।
उनका प्रसिद्ध कथन है—
“भारत के मुसलमान भारत के ही हैं। उनका पूर्वज भी यही है और भविष्य भी यही है।”
उन्होंने यह भी कहा—
“हम सबका डीएनए एक है।”
यह कथन केवल जैविक तथ्य की ओर संकेत नहीं करता, बल्कि उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सत्य की ओर इंगित करता है कि भारत के लोग हजारों वर्षों से एक साझा सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं।
इन विचारों ने अनेक मुसलमानों को संघ को समझने और उसके साथ संवाद स्थापित करने की प्रेरणा दी है।
आदरणीय इन्द्रेश कुमार जी और संवाद की परंपरा
Indresh Kumar ने वर्षों से विभिन्न समुदायों के बीच संवाद, सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए हैं।
उनका संदेश अत्यंत सरल है—
“नफरत किसी समस्या का समाधान नहीं है। प्रेम, संवाद और विश्वास ही समाज को जोड़ सकते हैं।”
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच और भारत फर्स्ट जैसे संगठन के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि राष्ट्रभक्ति और धार्मिक आस्था परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
उनके नेतृत्व में अनेक ऐसे कार्यक्रम हुए जिनमें विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ बैठकर राष्ट्रहित, सामाजिक समरसता और सद्भाव पर विचार करते हैं।
संघ और संवैधानिक मूल्य:
एक अधिवक्ता के रूप में मेरा अनुभव है कि संघ के संस्कार व्यक्ति को कर्तव्य, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर प्रेरित करते हैं।
संविधान का सम्मान, कानून का पालन और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानना संघ की कार्यसंस्कृति का महत्वपूर्ण भाग है।
संघ का स्वयंसेवक समाज को जोड़ने, सकारात्मक परिवर्तन लाने और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता फैलाने का प्रयास करता है।
न्यायालय से लेकर ग्राम पंचायत तक, शिक्षा से लेकर सेवा तक, संघ प्रेरित कार्यकर्ताओं ने विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में योगदान दिया है।
विश्वगुरु भारत की दिशा में
आज भारत विश्व मंच पर तेजी से उभर रहा है। आर्थिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक क्षेत्रों में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ रही है।
ऐसे समय में संघ का शताब्दी वर्ष केवल अतीत की उपलब्धियों का स्मरण नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का उद्घोष भी है।
विश्वगुरु भारत का अर्थ किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि मानवता को शांति, सह-अस्तित्व, समरसता और आध्यात्मिक जीवन का मार्ग दिखाना है।
संघ की शताब्दी यात्रा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
सौ वर्षों की यात्रा के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज भी उसी मूल भावना के साथ कार्य कर रहा है जिसके साथ उसकी स्थापना हुई थी—राष्ट्र प्रथम।
मेरे लिए, एक मुसलमान, एक अधिवक्ता और एक स्वयंसेवक के रूप में संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने मुझे भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में देखने की दृष्टि दी।
सरस्वती शिशु मंदिर और पार्वती बाई गोखले विद्यालय में मिले संस्कारों से लेकर सामाजिक जीवन और न्यायिक क्षेत्र तक, मैंने अनुभव किया है कि राष्ट्रप्रेम, सेवा, अनुशासन, समरसता और कर्तव्यबोध ही सशक्त भारत की आधारशिला हैं।
संघ के सौ वर्ष पूर्ण होने पर हम सब यह संकल्प लें कि आने वाले सौ वर्ष और अधिक उज्ज्वल, अधिक समरस और अधिक राष्ट्रनिष्ठ हों।
हम सेवा में विश्वास रखें, समरसता में आस्था रखें, संविधान का सम्मान करें, कर्तव्यों का पालन करें और भारत की अखंडता को सर्वोपरि मानें।
यही संघ की साधना है।
यही राष्ट्र की आराधना है।
यही भारत के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग है।
भारत माता की जय।
वंदे मातरम्।
हाजी शीराज़ क़ुरैशी अधिवक्ता
9893168910

