एक लेखक के अपने विचार..!
एक दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा है ?
सिंधिया का विरोध उन्हें ऊंचाइयों पर ले गया..
मप्र की ही नहीं देश की बेहया राजनीति की ये सबसे सुंदर तस्वीर है. इस तस्वीर में अतीत के कट्टर शत्रु वर्तमान के मित्र नजर आ रहे हैं.
एक तरफ हैं देश के एक चर्चित पूर्व राजघराने के प्रमुख ज्योतिरादित्य सिंधिया और दूसरे हैं बजरंगदल के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जयभान सिंह पवैया हैं.
मप्र की राजननीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया को बिना पानी पिए सामंतवादी कहकर कोसने वाले जयभान सिंह पवैया को हाल ही में मप्र सरकार ने मप्र वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाकर राजनीति में पुनर्वासित किया है.
भाजपा ने जयभान सिंह पवैया का इस्तेमाल सदैव सिंधिया का विरोध करने के लिए किया और लगातार इसके लिए पुरस्कृत भी किया.
जयभान सिंह पवैया ने माधवराव सिंधिया के आभामंडल को चुनौती दी और लाखों वोटों से जीतने वाले माधवराव की जीत को घटाकर 50 हजार पर लाकर खडा कर दिया था. पवैया हारकर भी जीते, अगली बार ग्वालियर से चुनकर संसद गए. मप्र में विधायक बने, मंत्री बने, राज्य बीस सूत्री कार्यक्रम समिति के प्रमुख बनाए गए. पवैया चुनाव हारे भी, नेपथ्य में भी गए लेकिन उन्होने सिंधिया का विरोध नहीं छोडा.
सिंधिया का विरोध करने वाले इस अभियान में पवैया के एक साथी प्रभात झा भी हुआ करते थे. पार्टी ने उन्हे भी सिंधिया विरोध का भरपूर ईनाम दिया था. झा भी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष से लेकर राज्य सभा तक भेजे गए थे. लेकिन 2020 में परिदृश्य बदल गया.ज्योतिरादित्य सिंधिया अचानक भाजपा में शामिल हो गए.
लगभग दो-ढाई दशक तक भाजपा के लिए खलनायक रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल होते ही न सिर्फ भाजपा के नायक बने बल्कि भाजपा की आंखों का तारा बन गए. हारकर सिंधिया के मुखर विरोधी जयभान सिंह पवैया को भी सिंधिया को नायक मानना पडा. पवैया की नजरों में जो सिंधिया परिवार 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बडा गद्दार था उसी से पवैया आज गुलदस्ता लेने को मजबूर हैं. पवैया की इस भूमिका से सामंतवाद के खिलाफ लडने वाले लाखों भाजपाई और आमजन स्तब्ध हैं. उनकी समझ में नही आ रहा कि आखिर वे पवैया को किस रूप में स्वीकार करें?
राजनीति बेहयाई और मजबूरी का दूसरा नाम होती है. पवैया जयभान सिंह इसका ज्वलंत उदाहरण हैं.
मुमकिन है कि इस भूमिका परिवर्तन को लेकर पवैया के पास दर्जनों तर्क हों लेकिन वे वीरांगना लक्ष्मीबाई की नजरों से तो उतर ही गए होंगे. ये बात और है कि पवैया ग्वालियर में वीरांगना लक्ष्मीबाई की स्मृति में दशकों से एक शहीदी मेले का आयोजन करते हैं. लक्ष्मीबाई दशकों तक पवैया के हाथों में सिंधिया परिवार पर प्रहार के प्रमुख हथियार की तरह इस्तेमाल की जाती थीं.
बहरहाल सिंधिया ने अपने पुराने राजनीतिक शत्रु जयभान सिंह पवैया को मप्र वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाने पर गुलदस्ता भेंटकर उन्हे बधाई दी. पवैया को बधाईया लेने सिंधिया के यहाँ खुद जाना पडा. इसे राजनीति की भाषा में आशीर्वाद लेना भी कहा जाता है. हालांकि सिंधिया जयभान सिंह पवैया से दो दशक छोटे हैं.
@ राकेश अचल
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